Sunday, 20 November 2016

ग़ज़ल की बारीकियों पर रौशनी डालती एक अच्छी पुस्तक ‘व्याकरण...ग़ज़ल का’





ग़ज़ल की बारीकियों पर रौशनी डालती एक अच्छी पुस्तक ‘व्याकरण...ग़ज़ल का’





‘ग़ज़ल’ शब्द आज किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है। अरबी से फ़ारसी और उर्दू से होती हुई हिंदी में आई ‘ग़ज़ल’ आज हिंदी साहित्य लेखन की एक महत्त्वपूर्ण विधा बन चुकी है। आज किसी भी पत्रिका को आप उठा लीजिए उसमें आपको प्राय: ग़ज़लें अवश्य मिलेंगी। आज जबकि बहुतायात से ग़ज़लें कही जा रही हैं तो उनमें कचरा भी बहुतायात से सामने आ रहा है। कई लोग तो ‘ग़ज़ल’ के बारे में बिना कुछ जाने ही दिन-रात ग़ज़ल लिख रहे हैं और न केवल पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो रहे हैं अपितु शान से अपने ग़ज़ल-संग्रह भी निकाले जा रहे हैं परंतु वरिष्ठ विद्वजनों को उनमें निहित त्रुटियों/दोषों को देखकर विचलित/दुःखी (‘ग़ज़ल का खून होता है तो मेरी रूह रोती है’-वाली स्थिति) होना स्वाभाविक है। इस तरह का त्रुटिपूर्ण/दोषपूर्ण ग़ज़ल लेखन आज ख़ूब देखने को मिल रहा है। थोड़े से प्रयासों/परिश्रम से ये त्रुटियाँ प्रकाशन के पूर्व सुधारी जा सकती हैं। हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए कि हमारी आज लिखी ये पुस्तकें आने वाली पीढ़ी के लिए सन्दर्भ-ग्रन्थ का कार्य करेंगी। अभी पिछले माह के मध्यांत में एक दिन हमने फोनवार्ता में सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार डा. कृष्ण कुमार ‘नाज़’ जी से ग़ज़ल के बारे में विमर्श के दौरान एक ऐसी पुस्तक की आवश्यकता महसूस करने की बात की जो एक आम पाठक और ग़ज़ल के मामले में बिल्कुल नौसिखिए को भी ग़ज़ल की बनावट/बुनावट की बारीकियों से रू-ब-रू करा सके और उसे सही तरीके से ग़ज़ल लिखने के लिए प्रेरित करे। यद्यपि हिंदी की कुछ लघुपत्रिकाओं में इस तरह के आलेख और कुछ में नियमित स्तम्भ भी निकल रहे हैं परंतु वो अपर्याप्त से लगते हैं। उन्होंने भी इस आवश्यकता को माना और बताया कि इसकी मुख्य वज़ह यह है कि आज हिंदी में गुरु-शिष्य की परम्परा विलुप्त हो चली है। नवोदित रचनाकार किसी को भी अपना गुरु बनाना पसंद नहीं करते। इसमें वे अपमान का अनुभव करते हैं, यहाँ तक कि किसी वरिष्ठ रचनाकार या मित्र से भी सहयोग या परामर्श नहीं लेना चाहते। यदि कोई मित्र या वरिष्ठ किसी दोष पर उन्हें टोकता है तो वो उसे अपना शत्रु समझने लगते हैं। जबकि उर्दू में गुरु-शिष्य परम्परा आज भी विद्यमान है। शिष्य यदि दो पंक्तियाँ भी लिखेगा तो उनको कहीं प्रकाशित कराने से पूर्व अपने गुरु को अवश्य दिखाएगा जिससे रचना दोषमुक्त हो सके लेकिन हिंदी में इस परम्परा का ह्वास होता जा रहा है, जो यकीनन एक दुःखद स्थिति है। इसी तरह की अन्य बातों के संग हमारी वार्ता विराम तक पहुँची। अगले दिन दोपहर को श्री ‘नाज़’ जी का वाट्सएप पर संदेश मिला-‘मैंने आज सुबह अपनी ग़ज़ल की एक किताब रजिस्टर्ड डाक से भेजी है, प्राप्ति की सूचना दें’ और हम उसी क्षण से पुस्तक-प्राप्ति हेतु प्रतीक्षारत हो गए...करीब एक सप्ताहोपरांत हमें जब पैकेट मिला तो हम खोलते ही हतप्रभ रह गए...जो स्वाभाविक भी था क्योंकि आप जिस चीज की आवश्यकता महसूस करें और वो आपको अगर कुछ ही समय में अचानक घर बैठे मिल जाए तो आप ख़ुशी और आश्चर्य के मारे शब्द-विहीन से हो उठते हैं कुछ पलों के लिए...जी हाँ, हमारा कारण भी कुछ ऐसा ही था क्योंकि उस पैकेट में जो पुस्तक निकली, उसका नाम था- ‘व्याकरण ग़ज़ल का’...






मित्रों, आज हम आपसे डा. कृष्ण कुमार नाज़ जी की उसी पुस्तक ‘व्याकरण...ग़ज़ल का’ की चर्चा करने को मुखातिब हैं और यह भी एक रोचक इत्तेफ़ाक है कि सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार डा. कृष्ण कुमार ‘नाज़’ जी से पिछले बरस हमारा परिचय भी एक पत्रिका में प्रकाशित उनकी बेहतरीन ग़ज़लें पढ़कर ही हुआ था। उसके उपरांत उनसे लगातार फ़ोन पर बातें होती रहीं और सम्पर्क आज तक बना हुआ है। वो जितने बढ़िया ग़ज़लकार हैं उससे बढ़िया इंसान हैं और जितने बढ़िया इंसान हैं उससे बढ़िया ग़ज़लकार हैं...। वार्तालाप के दौरान उनकी खनकती हँसी कानों में देर तक गूँजती रहती है। उनसे बातें करना एक सुखद अनुभव है। चलिए, अब उनकी पुस्तक ‘व्याकरण ग़ज़ल का’ की चर्चा हो जाए।


ग़ज़ल क्षेत्र में अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त ज़नाब कृष्ण बिहारी नूर के परम शिष्य और हिन्दी ग़ज़ल के सशक्त हस्ताक्षर डा. कृष्ण कुमार नाज़’ जी की देवनागरी में प्रकाशित पुस्तक 'व्याकरण...ग़ज़ल का' निश्चित रूप से ग़ज़ल प्रेमियों के लिए एक नायाब तोहफ़ा है। गुंजन प्रकाशन, मुरादाबाद (उ.प्र.) से प्रकाशित 112 पृष्ठों की यह पुस्तक सुन्दर आवरण, बेहतरीन कागज, प्रिंटिंग और साज-सज्जा लिए हुए है, जिसके लिए प्रकाशक निश्चय ही साधुवाद के पात्र हैं। सुप्रसिद्ध ग़ज़लकार जनाब दीक्षित दनकौरी साहब (दिल्ली) ने पुस्तक के दूसरे ब्लर्ब पर लिखा है, “ग़ज़ल के छंद विधान पर यूँ तो बहुत-सी पुस्तकें प्रकाशित हुई हैं, लेकिन ज़्यादातर फ़ारसी लिपि में हैं। हाँ, इधर कुछ हिंदी कवि मित्रों की पुस्तकें ग़ज़ल के छंद विधान पर आयी हैं लेकिन फ़ारसी लिपि से अनभिज्ञ होने के कारण वे पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकीं। ‘नाज़’ साहब ने चूँकि उर्दू बाकायदा सीखी है और उर्दू में एम.ए. किया है, इसीलिए उन्होंने उर्दू छंद शास्त्रियों का विस्तार से अध्ययन करके देवनागरी लिपि में यह पुस्तक लिखी है। मुझे पूर्ण विश्वाश है कि यह पुस्तक ग़ज़ल के विद्यार्थियों, ख़ासतौर से उन ग़ज़लकारों के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध होगी, जो फ़ारसी लिपि नहीं जानते और हिंदी में ग़ज़ल कह रहे हैं।“



इस पुस्तक में ग़ज़ल की बनावट और बुनावट की तमाम बारीकियों पर प्रकाश डाला गया है। पुस्तक का आरम्भ ग़ज़ल की भाव-भूमि से होता है और फिर द्वितीय अध्याय में उसकी प्रकृति और स्वरूप पर चर्चा है जिसमें ग़ज़ल की संरचना का बारीकी से विश्लेषण किया गया है यथा- मतला, शेर, मक़ता, मिश्रा, काफ़िया, रदीफ़, फ़र्द, ज़मीन, मिश्रा-ए-तरह, गिरह, तख़ल्लुस, फ़साहत, बलागत, मुसावत, सलासत, रवानी, मूसीकियत, के बारे में समझाया गया है। नाज़ साहब लिखते हैं, ‘छंद तो काव्य-रचना का सूत्र है, गणित है। सूत्र के अनुसार दो और दो चार ही होंगे, सवा चार या पौने चार नहीं हो सकते।‘ (एक हिंदी फ़िल्म के अनुसार ‘दो और दो पाँच’ थे वो दीगर बात है) । तृतीय अध्याय में छ्न्दगत विश्लेषण में अरबी फारसी बहरों और उनका हिंदी छन्दों से साम्य के विषय में विस्तृत चर्चा है। चतुर्थ अध्याय में हिन्दी ग़ज़ल के तमाम सन्दर्भ और अंत में पंचम अध्याय में गजल के शिल्पगत, कथ्यात्मक और भाषागत दोषों की शानदार जानकारी तमाम उदाहरणों के साथ दी गयी है। यहाँ कुछ सुप्रसिद्ध हिंदी ग़ज़लकारों के ऐसे शेर दिए गए हैं जिनमें किसी न किसी स्तर पर त्रुटियाँ दृष्टिगोचर होती है। नाज़ साहब के ही शब्दों में, “उनकी त्रुटिपूर्ण रचना देने का अर्थ उनके सम्मान को ठेस पहुँचाना नहीं, बल्कि ग़ज़ल के प्रति स्वच्छ और स्वस्थ वातावरण को उपस्थित करने का प्रयास है। यद्यपि मेरा उद्देश्य पवित्र है, तथापि मैं उन सभी से क्षमाप्रार्थी हूँ।“ इन शेरों में हुई त्रुटियों को देख/समझकर पाठक हतप्रभ रह जाता है और उसे ग़ज़ल की बारीकियों का भान तो होता ही है, साथ ही नाज़ साहब की पारखी नज़र और ग़ज़ल प्रेमी होने का अच्छा प्रमाण मिल जाता और अनायास ही पुस्तक के प्रथम ब्लर्ब में जनाब डा. आरिफ़ हसन खां, विभागाध्यक्ष, हिन्दू कालेज, मुरादाबाद की लिखी पंक्तियाँ याद आ जाती हैं, “ग़ज़ल के फ़न की बारीकियों और उसकी नज़ाकतों और लताफतों का बड़ी दीदारेज़ी से मुतालआ करती यह किताब वक़्त की ज़रूरत है और नये लिखने वालो की रहनुमाई के साथ-साथ पुराने लिखने वालों को भी अपनी इस्लाह का मौका देगी।“



मित्रों, पुस्तक की भाषा, शैली और प्रस्तुतीकरण ऐसा है कि आप एक बार इसे पढ़ना आरंभ करें तो आप उसे समाप्त करके ही दम लेंगे। सच कहें तो पुस्तक समाप्त होने पर यह दु:ख होता है कि यह इतनी जल्दी क्यों खत्म हो गई और बरबस ही मीर साहब का वो शेर याद आ जाता है:



                     बड़े शौक से सुन रहा था जमाना,

                     हम ही सो गए दास्तां कहते-कहते।

हमें पूर्ण विश्वास है कि सभी ग़ज़ल प्रेमियों के लिए यह पुस्तक ग़ज़ल सम्बन्धी तमाम आवश्यक जानकारी देने वाली एक महत्त्वपूर्ण और उपयोगी पुस्तक साबित होगी और साहित्य जगत में इसका भरपूर स्वागत किया जाएगा। इस नायाब मोती के लिए ज़नाब नाज़ साहब को हमारी ओर से कोटि-कोटि बधाई/शुभकामनाएं...और साथ ही अपनी इस पुस्तक से हमें रुबरु कराने हेतु हार्दिक आभार।


समीक्षक:

प्रो. डा. सारिका मुकेश

20 नवम्बर 2016



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किताब का नाम : व्याकरण...ग़ज़ल का

लेखक का नाम : डा. कृष्णकुमार ‘नाज़’

प्रकाशक : गुंजन प्रकाशन, मुरादाबाद (उ.प्र.)

प्रकाशन का वर्ष : 2016

कुल पृष्ठ : 112

मूल्य : रू.150/-

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