Saturday, 4 August 2012


कभी-कभी मौत भी
जब एक किताब लिखती है
तो जिन्दगी से
एक भूमिका लिखवाने के लिए आती है... 
-----अमृता प्रीतम

"संप्रेषणीयता का सवाल केवल शिल्प और भाषा का सवाल नहीं है! संप्रेषणीयता तो शत-प्रतिशत आदि से लेकर अंत तक मानवीय और प्राकृतिक संबंधों की वजह से ही बनती है और जहाँ इसका अभाव होता है, वहीं संप्रेषणीयता लुप्त हो जाती है!" ---केदारनाथ अग्रवाल  

लगता है सारी जिंदगी जो भी सोचती रही, लिखती रही, 
वह सब शायद देवताओं को जगाने का ही एक प्रयत्न था-
उन देवताओं को जो इंसान के भीतर सो गए हैं!       ----अमृता प्रीतम


मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ;
जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परोपेक्षिता से ना बचा सके,
उसके ह्रदय को परदुःखकातर न बना सके, 
उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है!       ----आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी


सरस्वती महाभागे विद्ये कमललोचने।
विद्यारूपे विशालाक्षि विद्यां देहि नमोस्तुते॥
O Devi Saraswati, the most Auspicious Goddess of Knowledge with Lotus-like Eyes, An Embodiment of Knowledge with Large Eyes, Kindly Bless me with Knowledge. I Salute you.